आनंद स्वरूप वर्मा।
प्रसिद्ध रंगकर्मी और हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय चरित्र अभिनेता कामरेड ए. के. हंगल बॉलीवुड की उन गिनी चुनी हस्तियों में से थे जिन्होंने कामर्शियल दुनिया में रहते हुए, जहां तक संभव हुआ आम आदमी की तकलीफों और आकांक्षाओं से किसी न किसी रूप में अपने को जोड़े रखा।
कामरेड हंगल विभाजन के बाद पाकिस्तान से आकर भारत में बसे थे।
छात्र जीवन से ही वह वामपंथी विचारों के करीब आ गए थे और सिंध की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए थे क्योंकि 1917 की बोल्शेविक क्रांति के महत्व को उन्होंने आत्मसात कर लिया था।
अपनी आत्मकथा में उन्होंने एक जगह लिखा है कि “रूसी क्रांति को सामाजिक न्याय का अग्रदूत मान लेने के बाद मैं अब उन प्रश्नों के जवाब तार्किक आधार पर पाने लगा था जो मुझे सताते रहते थे।
धर्म की व्याख्या करने लगा। मैं ‘कर्म’ और ‘फल’ में विश्वास नहीं कर सका।
माँ भरी जवानी में ही मर गई क्योंकि उसका समुचित उपचार नहीं किया गया।
मेरी बहन भी जवानी में ही मर गई क्योंकि उसकी पूरी देखभाल नहीं हुई।
इसे मैं उनके कर्मों का फल नहीं मानता।
हम दरिद्र थे क्योंकि शताब्दियों से हमारा शोषण होता आया है।
अब तक मैं इस लायक हो गया कि मैं कारणों को स्पष्ट रूप से देख और समझ सकूं... मैं पार्टी का सदस्य बन गया।“
कामरेड हंगल ‘इप्टा’ के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे।
पहली बार 1947 में उन्होंने कराची से अहमदाबाद आकर ‘इप्टा’ के राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया था।
1962 में वह फिल्मी दुनिया के संपर्क में आए।
उन्हें बासु भट्टाचार्य ने अपनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ में एक छोटी सी भूमिका निभाने का अनुरोध किया जिसे हंगल ने स्वीकार कर लिया।
200 से भी अधिक फिल्मों में काम करने के बाद भी एके हंगल अंत तक उसी छोटे से मकान में रहे जिसे उन्होंने 30 वर्ष पहले लिया था।
सादगी को उन्होंने अपने जीवन का अंग बना लिया था।
(चित्र में कामरेड हंगल का लाल झंडे में लिपटा पार्थिव शरीर)
(समकालीन तीसरी दुनिया, सितंबर 2012 से)
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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