
डॉ अमिताभ दुबे।
अरे भाई, मध्य प्रदेश के माननीय मंत्रीजी, जिनका शीश दशानन के दस शीशो मे से एक के सामान अहंकार युक्त तथा वाणी व्यास गद्दी वाले किसी "कथाचार्य" के समान मिश्री भरी हुई है, ने तो कमाल कर दिया! वैसे हमारे माननीय है बड़े भोले भाले-- जैसे अंदर से वैसे ही बाहर से। उनके मन, कर्म और वचन में कोई अंतर नहीं है।
इंदौर में दूषित पानी से लोगों की जानें जा रही हैं, अस्पताल भरे पड़े हैं, और मीडिया वाले सवाल पूछ रहे हैं कि भाई, पानी कब साफ होगा? दोषियों को दंड कब मिलेगा? तो माननीय जी का जवाब सुनकर हंसी छूट जाएगी – "छोड़ो यार, फोकट के प्रश्न मत पूछो! क्या घंटा पूंछ रहे हो तुम?"
वाह जी वाह! क्या बात है! अब तो लगता है कि मंत्रालय में दबी जवान मे चलने वाला स्लोगन सही है – "फोकट मे घंटा काम होगा"। मंत्री जी ने तो साबित कर दिया कि राजनीति में भाषा की कोई सीमा नहीं। फोकट में पानी दूषित हो जाए, फोकट में लोग बीमार पड़ जाएं, फोकट में मौतें हो जाएं, लेकिन सवाल पूछोगे तो घंटा मिलेगा! अरे, घंटा तो कांग्रेस वालों ने बजाया विरोध में, लेकिन माननीय जी ने तो घंटा शब्द को नया राजनीतिक हथियार बना दिया। अब हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में फोकट मे घंटा बजता होगा – नहीं, घंटा बोलते होंगे फोकट मे !
सोचिए जरा, अगर हर मंत्री ऐसे बोलने लगें तो क्या होगा? मुख्यमंत्री जी से पूछो – "सर, बेरोजगारी कब कम होगी?" जवाब – "फोकट मत पूछो, घंटा कम होगी!" या स्वास्थ्य मंत्री से – "अस्पतालों में दवाई कब आएगी?" – "अरे यार, फोकट का सवाल! क्या घंटा होकर आए हो?" पर नगरीय प्रशासन मंत्रीजी तो आगे निकल गए, उन्होंने फोकट और घंटा को मिलाकर नया शब्दकोश बना दिया। अब डिक्शनरी में एंट्री होगी: "फोकट प्रश्न – वो सवाल जो जनता की भलाई से जुड़े हों। घंटा जवाब – वो उत्तर जो मंत्री जी देते हैं जब थक जाते हैं।"
और सबसे मजेदार तो ये कि बाद में माफी मांग ली! वीडियो वायरल हुआ, बवाल मचा, कांग्रेस ने घंटा बजाकर प्रदर्शन किया, तो मंत्रीजी ने कहा – "सॉरी यार, गुस्से में घंटा निकल गया।" अरे भाई, घंटा निकल गया या फोकट में निकल गया? अब तो लगता है कि अगली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोर्ड लगेगा – "फोकट के सवाल पूछने पर घंटा जवाब मिलेगा, एडवांस में माफी भी!"
मंत्री जी, आप तो कमाल के हैं! इंदौर को स्वच्छ शहर बनाया, लेकिन अब भाषा को इतना 'स्वच्छ' कर दिया कि "फोकट" मे "घंटा" हर जगह बज रहा हैं। लगता है जिस प्रकार भगवान शिव ने समुद्र मंथन के पश्चात गरल को अपने हलक में रख लिया था ठीक उसी प्रकार इंदौर के स्वच्छता मंथन में इंदौर के कचरे को भी आपने अपने हलक में रख लिया है। सो पत्रकार के प्रश्न का जवाब देते समय आपको सत्ता के दंभ की खांसी आ गई और हलक में रखी हुई इंदौर की गंदगी आपकी भाषा पर चढ़ गई। है ना, मंत्री जी?जनता सोच रही है – पानी साफ कब होगा? जवाब – घंटा! विकास कब होगा? फोकट में! वोट कब मिलेंगे? घंटा बजाओ! ऐसा लगता है कि मंत्रीजी , आपकी ये घंटा-फोकट नीति तो सुपरहिट है। बस अगली बार जब मीडिया आए, तो कह देना – "फोकट में इंटरव्यू नहीं देंगे, घंटा बजाकर चले जाओ!"
लगे हाथ घंटा और फोकट को भाषा विज्ञान के डिकंस्ट्रक्शन के नजरिये से भी देख लेते है।
जैक्स डेरिडा के डिकंस्ट्रक्शन सिद्धांत के अनुसार, भाषा में कोई अर्थ कभी स्थिर नहीं होता। वह हमेशा "डिफरांस" (différance) की श्रृंखला में विलंबित और स्थगित होता रहता है। द्वंद्वात्मक विरोध – जैसे सत्ता/जनता, जिम्मेदारी/बहाना, संवेदना/असंवेदना – कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते, बल्कि एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं और अंततः खुद को विघटित कर देते हैं। अब इसी नजर से देखिए मध्य प्रदेश के माननीय नगरीय विकास मंत्री जी के ऐतिहासिक बयान को: "फोकट के सवाल मत पूछो... क्या घंटा होकर आए हो?"
यहाँ "फोकट" (फालतू, व्यर्थ) और "घंटा" (बोलचाल में 'कुछ नहीं', 'नonsense') शब्द जनता की पीड़ा को "व्यर्थ" घोषित करते हैं। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से दर्जनों मौतें हुईं, सैकड़ों बीमार पड़े, लेकिन मंत्री जी के लिए सवाल "फोकट" है। डिकंस्ट्रक्शन की नजर से देखें तो यहाँ एक क्लासिक बाइनरी ऑपोजिशन है: सत्ता का अर्थ (जिम्मेदारी) बनाम जनता का अर्थ (पीड़ा)। पश्चिमी विचारधारा में सत्ता हमेशा "श्रेष्ठ" मानी जाती है – वह जिम्मेदार, संवेदनशील, जवाबदेह। लेकिन मंत्री जी का बयान इस द्वंद्व को विघटित कर देता है। सत्ता खुद को "संवेदनशील" बताती है (बाद में माफी भी मांगी गई), लेकिन उसके शब्द जनता की पीड़ा को "घंटा" बता देते हैं। यानी सत्ता की संवेदना खुद पर निर्भर है, जनता पर नहीं। अर्थ स्थगित हो जाता है – जिम्मेदारी का कोई केंद्र नहीं बचता।
और हास्य तो देखिए: "घंटा" शब्द में ही एक खूबसूरत विरोधाभास छिपा है। घंटा मंदिर में बजता है – पूजा, श्रद्धा, चेतावनी का प्रतीक। लेकिन यहाँ वह "कुछ नहीं" का पर्याय बन गया। मंत्री जी ने अनजाने में खुद को मंदिर का घंटा बना लिया – बज रहा है, शोर मचा रहा है, लेकिन अर्थ? घंटा! जनता बजाए घंटा, कांग्रेस बजाए घंटा (प्रदर्शन में), और अंत में एक एसडीएम साहब ने सरकारी आदेश में "घंटा" लिख दिया तो उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। क्यों? क्योंकि सत्ता का "घंटा" तो बज सकता है, लेकिन फाइल में लिखा "घंटा" असहनीय हो जाता है। यहाँ डिकंस्ट्रक्शन पूरा हो जाता है: सत्ता का शब्द "मुक्त" है, लेकिन वही शब्द दस्तावेज में आते ही "अशोभनीय" बन जाता है। केंद्र (सत्ता) खुद अपनी परिधि (जनता/मीडिया/अधिकारी) पर निर्भर होकर ढह जाता है।
व्यंग्य की बात करें तो मंत्री जी ने साबित कर दिया कि "साफ-सुथरा इंदौर" का सपना अब "घंटा साफ" हो गया है। पानी गंदा, जवाब गंदा, और माफी भी थोड़ी देर से – जैसे अर्थ हमेशा विलंबित रहे। डेरिडा मुस्कुरा रहे होंगे: कोई अंतिम सत्य नहीं, सिर्फ ट्रेसस – घंटा के ट्रेसस, फोकट के ट्रेसस। जनता पूछती रहेगी, मंत्री जी कहते रहेंगे "फोकट", और अर्थ अनंत काल तक डिफर होता रहेगा।
आखिर में, डिकंस्ट्रक्शन हमें सिखाता है कि ऐसे बयानों को नष्ट नहीं करना, बल्कि उनके अंतर्निहित विरोधाभास को उजागर करना है। तो उजागर हो गया न? घंटा बज गया, लेकिन सवाल अभी भी जिंदा है – क्योंकि अर्थ कभी मरता नहीं, बस स्थगित होता रहता है। हंसिए मत, यह व्यंग्य नहीं, डिकंस्ट्रक्शन है!
और सबसे अंत में आपका यह नाचीज चार दशक तक अंग्रेजी भाषा और साहित्य का प्राध्यापक रहा है। लिहाजा किसी भी कथन को "इनफर" कर उसकी संदर्भ सहित व्याख्या करने में महारत हासिल है। सत्ता और शिव बूटी "भांग" के नशे में मदमस्त और हिंदुत्व का झंडा उठाएं चप्पल घिसते हुए एक दशक गुजरने के बाद भी प्रदेश के "मम्मा" ना बन पाने की खीज से भरे हुए माननीय मंत्री जी को यह प्रश्न चाबुक की चोट के समान घातक लगा। अतः जो कुछ भी उनके मुखश्री से निकला उसका तात्पर्य यह था कि एक "दो टके' का पत्रकार "फोकट" का प्रश्न कर उनका "घंटा" उखाड़ लेगा क्या? अरे भाई, मरने वालों को तो "फोकट" मे मोक्ष मिल गया, नहीं तो "घंटा" मिलता क्या? वैसे. इंदौरियों कि नजर मे "घंटा" का एक अर्थ भगवान शिव के "चार्टर्ड बी एम डबलू " नंदी बाबा की पिछली टांगो के बीच लटकने वाले अंग का भी होता है।और बिडंबना यह है कि ट्रम्प बाबू के मुल्क के स्टॉक एक्सचेंज भवन के बाहर स्थापित इसी जीव (बुल) की विशालकाय मूर्ति मे इसी अंग को दबाने को सौभाग्य सूचक माना जाता है और अपने यहाँ इसे दुर्भाग्य सूचक मान रहे है!
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